ब्लौग सेतु....

12 नवंबर 2017

हे प्रिय

ये सुनने मे कोई कष्ट नही

तुम किसी और की हो 

सत्य है ये 

कष्ट तो तब होता है

जब तुम मेरे वास्तविक स्वप्न मे आती हो

कदाचित न आया करो

हे प्रिय! 

तुम्हारे आने से मेरी सांस

ऊर्ध्वप्रवाहित होने लगती है 

कौन सा बल है तुम मे,

जो धरा के मनुष्य मे नही

यदि होता तो मेरे लिए सरल होता

प्रतिदिन टूटते इन अश्रुओं के बांध को 

एक स्थायित्व देना

     -- हिमांशु मित्रा

11 नवंबर 2017

जिंदगी का मान न कर

बड़ी ख़ुशी के लिए छोटी ख़ुशी को कुर्बान न कर 
खुदा के हसीं लम्हो का तू यूं अपमान न कर 
कतरा-कतरा मिट जाएगी तेरी जिंदगी यूं ही 
जन्नत जमीं पर है तेरी ,काबू में आसमान न कर  
समेट ले हर हसीं लम्हे को तू दामन में 
पहले ही देर है अब तू सुबह से शाम न कर 
धुलने दे दिल के जज़्बातों को किसी के आंसुओं से 
बेवजह यूं ही तू अपने पराये की पहचान न कर 
इन बेवफा साँसों का पल भर का भी भरोसा नहीं 
तू यूं ही सालों का इकठा सामान न कर 
 जहाँ जीत कर भी हासिल क्या हुआ सिकंदर को 
मौत साथ है तेरे तू इस जिंदगी का मान न कर 
तेरा ये ठिकाना कल किसी और का घर होगा हितेश 
जिंदगी की चाह में तू मौत को यूं बदनाम न कर

10 नवंबर 2017

डाकिया



डाकिया अब भी आता है बस्तियों में 
थैले में नीरस डाक लेकर, 
पहले आता था 
जज़्बातों से लबालब थैले में  आशावान सरस डाक लेकर। 


गाँव से शहर चला बेटा या चली बेटी तो माँ कहती थी -
पहुँचने पर चिट्ठी ज़रूर भेजना 
बेटा या बेटी चिट्ठी लिखते थे 
क़ायदे भरपूर लिखते थे 
बड़ों को प्रणाम 
छोटों को प्यार लिखते थे 
साथ लाये सामान का हाल लिखते थे 
ज़माने की चाल लिखते थे
थोड़ा लिखा बहुत समझना लिखते थे । 



साजन और सजनी भी ख़त लिखते थे 
आशिक़ महबूबा भी ख़त लिखते थे
मित्र-मित्र को प्यारे ख़त लिखते थे 
ख़त आचरण और यादों के दस्तावेज़ बनते थे
कभी-कभी ठोस कारगर क़ानूनी सबूत बनते थे 
डाकिया को  ख़त  कभी न बोझ लगते थे
ख़त पढ़कर सुनाने में महाबोझ लगते थे।

कभी  बेरंग ख़त भी आता था 
पाने वाला ख़ुशी से दाम चुकाता था 
डाकिया सबसे प्यारा सरकारी मुलाज़िम होता था 
राज़,अरमान,राहत,दर्द ,रिश्तों की फ़सलें बोता था  
डाकिया चिट्ठी  तार पार्सल रजिस्ट्री मनी ऑर्डर  लाता था  
डाकिया कहीं ख़ुशी बिखराता कहीं ग़म के सागर लाता था।  


आज भी डाकिया आता है
राहत कम आफ़त ज़्यादा लाता है
पोस्ट कार्ड नहीं रजिस्ट्री ज़्यादा लाता है
ख़ुशियों का पिटारा नहीं
थैले में क़ानूनी नोटिस लाता है। 

#रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / Word  Meanings 

बेरंग ख़त = ऐसा पत्र जो प्रेषक  द्वारा बिना टिकट लगाए या डाकघर में मिलने वाले लिफ़ाफ़े में रखकर न भेजा गया  हो बल्कि सादा  लिफ़ाफ़े में भेजा गया हो जिसे पाने वाला टिकट का दुगना दाम चुकाकर प्राप्त करता था।  समय और पैसे की कमी के चलते ऐसा किया जाता था / A  Without  Ticket  Letter

तार = आपातकालीन या ख़ुशी की सूचना अति शीघ्र पहुँचाने के लिए यह संचार सुबिधा बड़े डाकघरों में सुबह 8 बजे से रात्रि 9  बजे तक उपलब्ध होती थी।  27 शब्दों का शुल्क 50 रुपये लिया जाता था इस सुबिधा के 163 साल चलने के बाद 15 जुलाई 2013 को समापन के वक़्त / Telegram  



8 नवंबर 2017

वफ़ा लिपट कर थी रात भर रोई


कही  गुम है शदा  इसकी खबर क्या।
जब हमारे  हर दफा  अब सबर क्या।।

मका  भी  फुर्सत  से   लूटा  गया था।
लुट गया सब  रखे भी तो नजर क्या।।

वफ़ा  लिपट   कर  थी  रात  भर रोई।
गिरा अश्क जिधर देखे वो अधर क्या।।

हुई  खत्म   मुहब्बत   दरमियां  हमारे।
ज़हाँ  मैं   है   बता  कोई  अजर  क्या।।

मिरी   इस    हार    पर   वो   खुश  है।
बता  देखा   कभी   ऐसा   मंज़र  क्या।।

उसे  याद  तक  नही  आता 'मित्रा' ये।
जमी  दिल  की  रहेगी अब बंजर क्या।।
          
           ✍🏻✍🏻हिमांशु मित्रा 'रवि'

5 नवंबर 2017

ग़ज़ल



अफसान-ऐ-दर्द को नज्मो की तरह गाने की जरूरत नही है।
आश्ना हु मैं हाँ अब तुम्हे कुछ भी  बताने  की  जरूरत नही है।।

बन्द हो चुके  उसके लिए  अब इन  दिनों  इस राह के दरवाजे।
कह दो उसे उसको अब दिल-ए-राह आने की जरूरत नही है।।

हँस कर  हर  दफा  छोड़  देता  है  तुझे  वो बहुत  आसानी  से।
हर बार  की तरह  फिर से लौट कर आने  की जरूरत नही  है।।

हर तरफ ये कैसा  फ़ुसूँ है उस  सितमगर  की  हँसी  यादों  का।
हूँ तलबगार इन सब  का  इनको  मिटाने  की  जरूरत  नही है।।

तू अब कहा भी क्यों नही देता सितमगर के सभी  राज  जनिब।
उसका गम़्माज़ नही 'मित्रा' उससे छुपाने की  जरूरत  नही  है।।


           ---- हिमांशु मित्रा 'रवि' ---

30 अक्तूबर 2017

दर्द से फिर इस दिल को भर दो तुम


मुझको   फिर   से   बेकस  कर   दो  तुम।
दर्द  से  फिर  इस  दिल  को भर  दो  तुम।।

          कर    लो   नफरत    जिंतनी   करनी   है ।
          पर  लो   मुझको    मुरदा   कर   दो   तुम।।

मिल कर तुझसे किस्मत -ए- मुजरिम  हूँ ।
कुछ तो महफ़िल मे  अच्छा  कर  दो  तुम।।

          दिल   की    धड़कन   रुकने    लगती   है।
          इस   गुलशन   को   सहरा   कर  दो   तुम।।

मुझको    कहकर  अपना    इन   सब   से।
मुझको   फिर   से   अपना   कर  लो  तुम।।


               -- हिमांशु मित्रा 'रवि' --

26 अक्तूबर 2017

यादें


यादों का ये  कैसा जाना-अनजाना सफ़र है, 

भरी फूल-ओ-ख़ार से आरज़ू की रहगुज़र है। 


रहनुमा  हो जाता  कोई, 

मिल जाते हैं हम-सफ़र,

रौशनी बन  जाता  कोई,

हो  जाता   कोई   नज़र,

ऐसी लगन बेताबियों की,

हो जाता कोई दरबदर है।



याद   धूप   है  याद  ही  छाँव  है,

तड़प-ओ-ख़लिश का एक गाँव है, 

याद  रात   है  याद  ही   दिन  है,

न फ़लक़-ज़मीं पर होता  पाँव है,

हिय  में  हूक  होती  है  पल-पल,
  
बस  बेक़रारी में चश्म-ए-तर  है। 




सुध  न  तन  की  न  ही मन  की,
   
तसव्वुर में रहती  तस्वीर उनकी,
  
ठौर-ए-वस्ल ताजमहल लगता है,

आब-ए-चश्म गंगाजल लगता है,

बे-ख़ुदी में रहती किसे क्या ख़बर,

कब शब  हुई  कब आयी सहर  है। 




दौर-ए-ग़म   में  भाता  नहीं  मशवरा,

लगता ज्यों चाँदनी रात में हो बारिश,

आये हवा उनके दयार की तो लगता है,

छुपा  है  इसमें  संदेशा और सिफ़ारिश,

ज़माने   की  लाख  बंदिशों  को  तोड़ने,

  बार-बार  दिल  में उठती एक  लहर है।   

#रवीन्द्र सिंह यादव 

24 अक्तूबर 2017

हमरी ताउम्र की पतझर भइली.....डॉ .राकेश श्रीवास्तव

रउवा अइली तो जिन्दगी अइली ;
रउवा गइली तो जिन्दगी गइली .

ना पसीजी कसम ओ विनती से ;
रउवा काहे कठोर हो गइली .

प्रेम की ज्योति बुझइलू रउवा ;
आग हमरी घंघोर हो गइली .

रउवा कोंपल नई उगा लेबू ;
हमरी ताउम्र की पतझर भइली .

हमरी अंखिअंन में ख्वाब फिर न बसें ;
रउवा अंसुअंन का पहरा दे गइली .

दिल - लगी रउवा दिल्लगी समझी ;
दिल की दुर्गति हमार कर गइली .

रउवा खातिर जो मोहब्बत खेला ;
हमरा खातिर तो इबादत रहिली .

हम केहू से नहीं कहा दुखड़ा ;
ढल के ग़ज़लन में , शोर हो गइली .
गोमती नगर ,लखनऊ .
( शब्दार्थ > रउवा = आप / तुम )

23 अक्तूबर 2017

ख़्यालों का सफ़र




अल्फ़ाज़ है कुछ माज़ी के 
दिल कभी भूलता ही नहीं
नये-पुराने घाव भर गए सारे  
दर्द-ओ-ग़म राह ढूँढ़ता ही नहीं। 



उम्र भर साथ चलने का वादा है 
अभी से लड़खड़ा गए हो क्यों ?
प्यास बुझती कहां है इश्क़ में 
साहिल पे आज आ गए हो क्यों ?



गर  न  हों  फ़ासले  दिल में   
तो दूरियों की परवाह किसे
नग़मा-ऐ-वफ़ा गुनगुनाती हो धड़कन
तो सानेहों की परवाह किसे। 



छूकर फूल को महसूस हुआ 
हाथ आपका जैसे छुआ हो 
रूह यों जगमग रौशन हुई
ज्यों रात से सबेरा हुआ हो। 

#रवीन्द्र सिंह यादव     

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
अल्फ़ाज़ = शब्द, शब्द समूह  ( लफ़्ज़ का बहुवचन ) / WORDS 

माज़ी = अतीत ,भूतकाल / PAST 

दर्द-ओ-ग़म= दर्द और ग़म / PAIN AND SORROW 

साहिल =समुद्री किनारा / SEA SHORE ,COAST  

फ़ासले = दूरी / DISTANCE 

सानेहों = त्रासदी (त्रासदियों ) / TRAGEDIES 

रूह= आत्मा / SOUL ,SPIRIT 

16 अक्तूबर 2017

ख़ाकी

समाज को सुरक्षा का एहसास, 

क़ानून की अनुपालना के लिए  

मुकम्मल मुस्तैद मॉनीटर, 

मज़लूमों की इंसाफ़ की गुहार ,

हों गिरफ़्त में मुजरिम-गुनाहगार ,

हादसों में हाज़िर सरकार , 

ख़ाकी को दिया ,

सम्मान और प्यार ,

अफ़सोस कि इस रंग पर ,

रिश्वत ,क्रूरता ,बर्बरता,अमानवीयता,ग़ैर-वाजिब हिंसा ,

विवेकाधिकार का दंभ ,भेदभाव का चश्मा, काला पैसा ,

सत्ता के आगे आत्मसमर्पण ,

पूँजी की चौखट पर तर्पण,

ग़रीब फ़रियादी को दुत्कार ,

आसमां से ऊँचा अहंकार , 

मूल्यों-सिद्धांतों को तिलांजलि !

 दे दी शपथ को  भी   श्रद्धांजलि !!

इतने दाग़-धब्बों के साथ,

ख़ाक में मिल गये  हैं, 

ख़ाकी को मिले अलंकरण ..!!!!!!

यक़ीनन हो समर्पित 

जो किये हैं धारण 

ख़ाकी रंग हूबहू

   उन्हें शत-शत नमन।  

#रवीन्द्र सिंह यादव 

10 अक्तूबर 2017

मां की उपमा केवल है, मां सचमुच भगवान है.

ये बताते हुए मन बहुत आहत है कि....
दिनांक 8 अकतुबर 2017 को....
हमारे इस कविता  मंच की रचनाकार  आदरणीय पमी बहन की पूजनीय माता जी का अक्समात निधन हो गया....
उन्हें मैं अश्रुपूरित श्रद्धांजली अर्पित करता हूँ
एवं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ
कि शोक संतप्त बहन पमी जी  व परिवार को
इस असीम दुःख को सहने की  क्षमता प्रदान करे


1. मां: जगदीश व्योम

मां कबीर की साखी जैसी,
तुलसी की चौपाई-सी,
मां मीरा की पदावली-सी,
मां है ललित रुबाई-सी.

मां वेदों की मूल चेतना,
मां गीता की वाणी-सी,
मां त्रिपिटिक के सिद्ध सुक्त-सी,
लोकोक्तर कल्याणी-सी.

मां द्वारे की तुलसी जैसी,
मां बरगद की छाया-सी,
मां कविता की सहज वेदना,
महाकाव्य की काया-सी.

मां अषाढ़ की पहली वर्षा,
सावन की पुरवाई-सी,
मां बसन्त की सुरभि सरीखी,
बगिया की अमराई-सी.

मां यमुना की स्याम लहर-सी,
रेवा की गहराई-सी,
मां गंगा की निर्मल धारा,
गोमुख की ऊंचाई-सी.

मां ममता का मानसरोवर,
हिमगिरि-सा विश्वास है,
मां श्रृद्धा की आदि शक्ति-सी,
कावा है कैलाश है.

मां धरती की हरी दूब-सी,
मां केशर की क्यारी है,
पूरी सृष्टि निछावर जिस पर,
मां की छवि ही न्यारी है.

मां धरती के धैर्य सरीखी,
मां ममता की खान है,
मां की उपमा केवल है,
मां सचमुच भगवान है.

2. बेसन की सोंधी रोटी पर: निदा फाजली

बेसन की सोंधी रोटी पर,
खट्टी चटनी जैसी मां.

याद आती है चौका-बासन,
चिमटा फुकनी जैसी मां.

बांस की खुर्री खाट के ऊपर,
हर आहट पर कान धरे.

आधी सोई आधी जागी,
थकी दोपहरी जैसी मां.

चिड़ियों के चहकार में गूंजे,
राधा-मोहन अली-अली.

मुर्गे की आवाज से खुलती,
घर की कुंडी जैसी मां.

बिवी, बेटी, बहन, पड़ोसन,
थोड़ी थोड़ी सी सब में.

दिन भर इक रस्सी के ऊपर,
चलती नटनी जैसी मां.

बांट के अपना चेहरा, माथा,
आंखें जाने कहां गई.

फटे पुराने इक अलबम में,
चंचल लड़की जैसी मां.


8 अक्तूबर 2017

करवा चौथ


कार्तिक-कृष्णपक्ष  चौथ का चाँद 
देखती हैं सुहागिनें 
आटा  छलनी  से....  
उर्ध्व-क्षैतिज तारों के जाल से 
दिखता चाँद 
सुनाता है दो दिलों का अंतर्नाद। 


सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प 
होता नहीं जिसका विकल्प 
एक ही अक्स समाया रहता 
आँख से ह्रदय तक 
जीवनसाथी को समर्पित 
निर्जला व्रत  चंद्रोदय तक। 


छलनी से छनकर आती चाँदनी में होती है 
सुरमयी   सौम्य सरस  अतीव  ऊर्जा 
शीतल एहसास से हिय हिलोरें लेता 
होता नज़रों के बीच जब छलनी-सा  पर्दा।  


बे-शक चाँद पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है
उबड़-खाबड़  सतह  पर  कैसा ईश अनुग्रह है ? 
वहां जीवन अनुपलब्ध  है 
न ही ऑक्सीजन उपलब्ध है 
ग्रेविटी  में छह गुना अंतर है 
दूरी 3,84,400 किलोमीटर है 
फिर भी चाँद हमारी संस्कृति की महकती ख़ुशबू है 
जो महकाती है जीवन पल-पल जीवनभर अनवरत......! 

#रवींद्र सिंह यादव 

6 अक्तूबर 2017

एक रोज।।





एक रोज छुपा दूंगा
सारे लफ्ज तुम्हारे
और तुम मेरी खामोशी
पर फिसल जाओगी!!
देखता हूँ कब तलक
छुपी रहोगी मुझसे
एक दिन अपनी ही
नज्म से पिघल जाओगी!!
और कितने चांद
मेरे लिए संभालोगी
मुझे यकीन है कि
तुम रातें बदल डालोगी
मैंने भी रख लिए हैं
कुछ चादं तुम्हारे
मेरे एक ही ख्वाब से
बेशक तुम जल जाओगी!!
अब दोनों होगें ही
तो नज्म नज्म खेलेंगे
वो गोल ना सही
दिल सा भी हो तो ले लेगें
मैने भी भर लिये
कुछ अल्फाज़ तुम्हारे
मेरी खामोशी से
यकीनन तुम बदल जाओगी!!


3 अक्तूबर 2017

अभावों के होते हैं ख़ूबसूरत स्वभाव

आज एक चित्र देखा मासूम फटेहाल भाई-बहन किसी आसन्न आशंका से डरे हुए हैं और बहन अपने भाई की गोद में उसके चीथड़े हुए वसन थामे अपना चेहरा छुपाये हुए है -


अभावों के होते हैं ख़ूबसूरत  स्वभाव, 
देखती हैं नज़रें भाई-बहन के लगाव। 

हो सुरक्षा का एहसास  तो भाई का दामन ,
ढूंढ़ोगे ममता याद आएगा माई का दामन। 

जीवन हमारा है बना  दुःखों  की चक्की, 
पिसते रहेंगे सब  चाहे हों लकी अनलकी। 

ज़माने से हम भी  हक़  हासिल करेंगे, 
आफ़त पे जीत बे-शक  हासिल करेंगे। 

है प्रभु का शुक्राना  आज सलामत हैं हम, 
किस लमहे की आख़िर ज़मानत हैं हम ?
#रवीन्द्र सिंह यादव 

27 सितंबर 2017

अपनी अस्मिता क़ुर्बान करनी चाहिए थी ?

कुलपति साहब तो क्या 
उस छात्रा को 
संस्थान की अस्मिता के लिए 
अपनी अस्मिता 
क़ुर्बान करनी चाहिए थी ?
बीएचयू  के मुखिया को 
ऐसी बयानबाज़ी करनी चाहिए थी ?


जो बेटियों द्वारा संस्थान की अस्मिता के लिए 

आहूत शुद्धि-यज्ञ को 
सियासी साज़िश बताते हैं
ऐसी विभाजनकारी मानसिकता के 
लोग भी सरकारी कृपा से कुलपति बन जाते हैं।   

सभ्यता की सीढ़ियाँ 
चढ़ता मनुष्य 
पशुओं से अधिक 
पाशविक-व्यवहार पर 
उतर आया है 
घटना का ज़िक्र देख-सुन 
आँखों में लहू उतर आया है। 

साइकिल पर शाम साढ़े छह बजे 
बीएचयू कैंम्पस में हॉस्टल जाती 
17 वर्षीय एक  छात्रा के 
वस्त्रों में 
बाइक पर सवार होकर 
हाथ डालने के संस्कार 
किसी  माँ-बाप ने 
अपने अशिष्ट,मनोरोगी बेटे को दिये  हैं ?


मीडिया प्रबंधन की 
पोल खुल गयी है 
विज्ञापनों के फेर में 
मीडिया-मालिक की ज़ेहनियत  पर 
फ़रेबी-संवेदना की कलई अब  धुल गयी है। 


अफ़सोस कि वाराणसी एक तीर्थ है 
जहाँ  भी मानवता को 
शर्मसार करने वाले भेड़िये पलते हैं 
सर्वविद्या की सांस्कृतिक राजधानी में
वर्जनाओं की फ़ौलादी ज़मीं पर 
सामंतवादी पुरुषसत्ता की टकसाल में 
सांस्कृतिक बेड़ियों के सिक्के ढलते हैं।   


धरने पर बैठी बेटियाँ 
अपनी सुरक्षा के लिए 
सड़क पर रात गुज़ारती हैं
अगली अँधेरी रात में वे निहत्थी हैं फिर भी 
पुरुष-पुलिस की सर पर लाठियां खाती हैं। 

कमाल का मलाल है बनारसी लोगों के मन में   
उन्हें अफ़सोस है कि प्रधानमंत्री के काफ़िले का रुट बदलने से 
उनके द्वार की मिटटी पवित्र न होने पाई ... .!  

सुनो ! 
खोखली मान्यताओं के पहरेदारो 
बेटी  है अब सड़क पर  उतर  आई 
नए मूल्यों की इबारत लिखने से रोक पाओगे ?
सुनो!
पशुओं को भी लज्जित  कर देने वाले दरिंदो 
तुम भी किसी के जीवनसाथी क्या अब बन पाओगे ? 
तुम किसी माई के लाल हो 
किसी बाप की नाक का बाल हो 
तुम भी किसी बहन के  हो  भाई 
या किसी बेटी के  बनोगे  बाप..!  
तुम्हारा ज़मीर जाग जाय तो अच्छा है 
वरना  जीवनभर अंधकार में भटकोगे कचोटेगा  संताप..!  


ख़ुफ़िया-तंत्र को चुल्लूभर पानी काफ़ी है 
हमारी ओर से उसे नहीं कोई माफ़ी है। 
ख़बर है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की 
नींद आज खुल गयी  है 
राष्ट्रीय महिला आयोग की 
न जाने क्यों घिग्घी बंध गयी है ?
#रवीन्द्र सिंह यादव 


शब्दार्थ / पर्यायवाची।   WORD MEANINGS 
कुलपति= विश्वविद्यालय का शीर्ष अधिकारी /VICE  CHANCELLOR  
संस्थान - INSTITUTE 
अस्मिता = गौरव ,गरिमा , अभिमान ,पहचान / PRIDE / MODESTY 
क़ुर्बान= मिटा देना(स्वयं को ) , बलिदान करना , त्याग करना /                             SACRIFICE 
बीएचयू = बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी 
पाशविक व्यवहार= पशुओं जैसा बर्ताव , नृशंस व्यवहार /BEHAVE                                         LIKE ANIMAL, BRUTAL ACTIVITIES 
साइकिल = मानवीय ऊर्जा से चालित दो पहिया वाहन / BICYCLE 
              (BI = दो , CYCLE = चक्र / पहिया अर्थात जिसमें दो पहिये हों )
बाइक = मोटर साइकिल, स्वचालित दो पहिया वाहन / MOTOR                           CYCLE  / BIKE 

अशिष्ट = असभ्य , शिष्टाचार से परे ,बदतमीज़ ,गुस्ताख़ /                                       UNCIVILIZED
फ़रेबी-संवेदना= छुपे ग़लत मक़सद की संवेदना / FALSE                                                 SENSITIVITY 
ज़ेहनियत = मानसिकता / MENTALITY 

19 सितंबर 2017

आँखें




ख़ामोश अदा चेहरे की ,

व्यंगपूर्ण मुस्कान 

या ख़ुद को समझाता तसल्ली-भाव....?

आज आपकी डबडबाई आखों में 

आयरिस  के आसपास, 

तैरते हुए चमकीले मोती देखकर.....

मेरे भीतर भी कुछ टूटकर बिखर-सा गया है ......!   




ज़ार-ज़ार रोती आँखें 

मुझे भाती नहीं ,

आँखें हैं कि शिकायती-स्लेट 

बनने से अघाती नहीं। 



आपका कभी आँचल भीगता है 

कभी  मेरा  रुमाल ,

बह जायें आँसू फिर देखिये 

चंचल नयनों के कमाल। 



किसी दामन में सर झुकाकर 

सुकूं मिलता है भरी आँखों को ,

क़लम कहाँ लिख पाती 

 पाकीज़गी-ए-अश्क़ के  उन ख़्यालों को।   



आप मेरे दिल में उतरे 

मैं  आपके  दिल  में ,

गुफ़्तुगू  ख़ूब  हुई 

दो दिलों की महफ़िल में। 

तड़प के सिवाय कुछ मिला क्या .... ?

खनकते एहसास लिए 

तमन्नाओं का हसीं कारवाँ मिला ,

तभी तो चल पड़ा 

इश्क़ का नाज़ुक-सा सिलसिला। 



मैं अपनी गुस्ताख़ी  

ढूँढ़कर  ही  रहूँगा 

ख़ज़ाना-ए-दिल बहने का 

सबब तलाश कर ही लूँगा। 



क्योंकि आपने आज मुझे टफ  टास्क दिया है -

"दिल में ऐसा क्या चुभता है 

कि ज़ुबाँ चुप रहती है ,

आँखें बयाँ करती हैं ?"



कब से हम खुलकर  मुस्काये नहीं 

गए वक़्त की रुस्वाइयाँ  बयां करती हैं ,

चेहरे  पर उदासी का पहरा 

और झुकी-झुकी पलकें 

बे-रूखी का क़िस्सा बयां करती हैं। 



है  हार  क़ुबूल  मुझे 

रणछोड़दास जी का 

पथ अनुगमन करता हूँ ,

चेहरे  पर खिली तबियत हो  

ईष्ट  को  नमन  करता  हूँ।  

बस यही दुआ और इल्तिजा करता हूँ -

ज़िन्दगी को जीभर खिलने-मुस्कराने दो अब ,

सपनों में भी आँसुओं को  न ज़ाया होने दो अब। 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दों के अर्थ /पर्यावाची / WORD  MEANING 


आयरिस = आँख की पुतली / IRIS / PUPIL 


पाकीज़गी-ए-अश्क़ = आँसुओं  की पवित्रता / PURITY OF TEARS 


ख़ज़ाना-ए-दिल = आँसू / TEARS 


गुस्ताख़ी  = ढिठाई , बे-अदबी ,अशिष्टता /ARROGANCE 


टफ  टास्क = कठिन, चुनौतीभरा  कार्य / TOUGH TASK 


रुस्वाइयाँ= बदनामियाँ / DISGRACES 


रणछोड़दास = श्रीकृष्ण / LORD KRISHNA