ब्लौग सेतु....

24 जुलाई 2017

गाजे घन....................

घनन घनन घन गाजे घन
सन सन सनन समीर
छनन छनन छन पायलें
कल कल नदिया नीर

कुहू कुहू कुक कोयली
पिहू पिहू मित मोर
हर रही चित चंचल को
सुखद सुहानी भोर
अंबर तक उड़ता आँचल
लहरे मन के तीर.      घनन घनन घन........

मगन मगन मन मीत का
बहके बहके नैन
मचलूँ निरखूँ रूप को
पाऊँ कैसे चैन
कड़वी तुमसे दूरियाँ 
मीठी मन की पीर.      घनन घनन घन........

खनन खनन खन कँगना
लगन अगन के फेर
मनन रुठन संग साजना
चुहल साँझ सवेर
बाँटे तोहफ़े प्रीत के
दोनों प्रेम फ़कीर.      घनन घनन घन........

…………………. © के. एल. स्वामी ‘केशव’


सत्य....



एक दिन इस प्रतिस्पर्धा  का अंत हो  जायेगा।
एक  दिन तू  अंतहीन  निद्रा  में  सो  जायेगा।।

बहुत परिश्रम किया है तुमने  ने जिसे पाने में।
एक दिन वो सब इस आभास  मे खो जायेगा।।

अचेत  पड़ा  होगा  तू   इस  धरा  की  गोद मे।
तब  कोई  आकर   तेरे  शव  पर  रो  जायेगा।।

दुर्गंध बहुत आयेगी तब तेरे शुभचिंतक को भी।
तेरे   सिरहाने  कुछ  अगरबत्तिया  बो  जायेगा।।

घृणा बहुत है तेरे लिये  जिनके  भी अंतर्मन मे ।
एक दिन  स्नेह  ही होगा  तेरे दर  जो  जायेगा।।

जल्दी होगी  लोगो  को तेरे  अंतिम संस्कार मे।
अश्रुओं का एक  झुंड तेरे  शव को धो जायेगा।।

जन्म मिला है जिसको  भी इस दुनिया मै देख।
एक दिन  निश्चय ही इस धरती  से वो  जायेगा।।

अभिमान  क्या  करना 'मित्रा' नश्वर  शरीर पर।
एक दिन आग से लिपट कर  राख हो  जायेगा।।

                   .  ----  हिमांशु मित्रा 'रवि' ----

22 जुलाई 2017

ख्वाहिशों का पंछी

बरसों से निर्विकार,
निर्निमेष,मौन अपने
पिंजरे की चारदीवारियों
में कैद, बेखबर रहा,
वो परिंदा अपने नीड़
में मशगूल भूल चुका था
उसके पास उड़ने को
सुंदर पंख भी है
खुले आसमां में टहलते
रुई से बादल को देख
शक्तिहीन परों को
पसारने का मन हो आया
मरी हुई नन्ही ख्वाहिशे
बुलाने लगी है पास
अनंत आसमां की गोद,
में भूलकर, काटकर
जाल बंधनों का ,उन्मुक्त
स्वछंद फिरने की चाहत
हो आयी है।
वो बैठकर बादलों की
शाखों पर तोड़ना
चाहता है सूरज की लाल
गुलाबी किरणें,देखना
चाहता है इंद्रधनुष के
रंगों को ,समेटना
चाहता है सितारों को,
अपने पलकों में
समाना चाहता है
चाँद के सपनीले ख्वाब
भरना चाहता है,
उदास रंगहीन मन में
हरे हरे विशाल वृक्षो़ के
चमकीले रंग,
पीना है क्षितिज से
मिलती नदी के निर्मल जल को
चूमना है गर्व से दिपदिपाते
पर्वतशिख को,
आकाश के आँगन में
अपने को पसारे
उड़ान चाहता है अपने मन
के सुख का,
नादां मन का मासूम पंछी
भला कभी तोड़ भी पायेगा
अपने नीड़ के रेशमी धागों का
सुंदर पिंजरा,
अशक्त पर, सिर्फ मन की उडान
ही भर सकते है,
बेजान परों में ताकत बची ही नहीं
वर्जनाओं को तोड़कर
अपना आसमां पाने की।

     #श्वेता🍁

18 जुलाई 2017

रेप-----अंजली अग्रवाल

आज मुझे एक बार फिर आदरणीय अंजली अग्रवाल जी की ये कविता याद आ गयी....

पानी के बुलबुले सी एक लड़की थी ॰॰॰॰

होठों पर मुस्कान लिये घर से निकली थी ॰॰॰॰

कि पड़ नजर शैतानों की॰॰॰॰

और डूब गयी नाव इंसानियत की॰॰॰॰

ओढ ली थी काली चादर आसमान ने॰॰॰॰

निर्वस्त्र कर दिया था भारत माँ को आज इस संसार ने॰॰॰॰

चीखें गूँजती रही मासूम सी जान की॰॰॰॰

बन गयी शिकार वो शैतानों के हवस की॰॰॰॰

कहर की अविरल धारा बहती रही॰॰॰॰

और वो ओस की बूंन्दो सी पिघलती रही ॰॰॰॰

जिस्म गलता रहा और तड़पती रही वो॰॰॰॰

आखिर बन ही गयी लाश वो॰॰॰॰

उसकी मृत आँखें जैसे सारा किस्सा बयां करती थी॰॰॰॰

उसके मृत होंठ सिसकते यह कहते थे कि॰॰॰॰

“ यह संसार नहीं दरिंदों का मेला है, नहीं रहना अब मुझे इस दुनिया में ,

यहाँ सिर्फ अपमान मेरा है ।”

“आज रेप मेरा नहीं इस देश का हुआ है, क्योंकि इस देश का कानून , अंधा है।”

उसकी मृत काया मानो चीख—चीख कर एक ही गुहार लगाती हो॰॰॰॰

“ कि तभी आग लगाना इस शरीर को॰॰॰॰

जब सुला दो इन लड़कियों में उन दरिंदों को

और दिला न पाये इंसाफ मुझे, तो सड़ जाने देना इस शरीर को ॰॰॰॰

क्योंकि जल तो गयी थी मैं , उसी दिन को॰॰॰॰

अब क्या जलाओगे तुम इस राख को —

इस राख को ”





17 जुलाई 2017

नई सुबह की नई किरण



ह्रदय  को  वो  चाहे   जितना  समझाले
फिर भी तो  उसको  थोड़ा  दुःख  होगा।
देख  कर  हाथो  की  गीली  मेहँदी  को
आज स्वयं उसका मुख भी बेमुख होगा।।

               कंधे पर जो हाथ कभी  रखती  थी वो
               हरी सौ  चूड़ियों  से  कल भर  जाएगा।
               चढ़ा हुआ जो आंख तलक  एक  आँसू
               छोड़ नयन को वो भी अब गिर जाएगा।।

पहनकर  लाल  रेशमी  जब वो  जोड़ा
श्रृंगार सोलवह कर रूप  सँवर आयेगी।
देखकर  सौन्दर्य आज  उस  दुल्हन  का 
ये रात  चांदनी  भी  कुछ  शर्म  जायेगी।।

               झनक  झनक कर पायल भी जब उसकी
               धुन छेड़  कर  ये  बिछड़न  राग  सुनायेगी ।
               सुनकर गीत  स्वयं की  पायल के  मुख  से
               सुप्त  स्मृतियाँ  ह्रदय  मे  घर  कर  जायेगी ।।

भरा  मांग  मे  उसकी  जो सिंदूर  ये  देखो
आज  पवित्रता   उसकी    और  बढ़ायेगा ।
सृजन किया है जीवन भर जिन रिश्तों का 
रूप   परिवर्तित  उनका  ये   कर   गायेगा ।।

               लगी हुई बिदिया ये चाँद के  मस्तक  पर
               किसी के प्रति ये समर्पण  को  दर्शाती  है ।
               हुआ अधिकृत ये सब तन मन भी उसका
               सात जन्मों  की  रूप-रेखा  समझाती  है ।।

नई सुबह की नई किरण मे वो आज
तोड़ वादों को कर लेगी स्वयं विदाई ।
चलना ही है इस चलनमय जीवन को
उसने भी इस संसार की रस्म निभाई ।।

               करता हूँ अब अंतिम अधिकार समर्पित
               याद नही  मैं  अब  उसको  कर  पाऊंगा ।
               मर्म  छुपा  लूँगा  दिल  मे  सच  कहता  हूँ
               अब   मैं  नही   किसी   को   बतलाऊँगा



                  -----  हिमांशु मित्रा 'रवि' --

16 जुलाई 2017

ख़ालीपन से दूर .....

           

     उठो चलो
     जी चुके बहुत
     सहारों में,
     ढूँढ़ो  न आसरा
     धूर्तों-मक्कारों में।


      सुख के पलछिन

      देर-सवेर
      आते तो हैं ,
      पर ठहरते नहीं
      कभी  बहारों में।


     मतवाली हवाओं

     का आना -जाना
     ब-दस्तूर ज़ारी है ,
     ग़ौर  से देखो
     छायी है धुंध
     दिलकश नज़ारों में।


     फ़ज़ाओं की

    बे-सबब  बे-रुख़ी से
     ऊब गया है मन ,
     फुसफुसाए जज़्बात
     दिल की
     दीवारों में।


     रोने से

     अब   तक   भला 
     किसे क्या मिला,
     मिलता है
     जीभर सुकूं
     वक़्त के मारों में।


     हवाऐं ख़िलाफ़

     चलती हैं
     तो चलने दे ,
     जुनूं लफ़्ज़ों से
     खेलने का
     पैदा कर क़लमकारों  में।


    मझधार की

    उछलती  लहरें
    बुला रही हैं,
    कब तक
    सिमटे  हुए 
    बैठे रहोगे  किनारों में।


     परिंदे भी

    चहकते ख़्वाब
    सजाते रहते हैं ,
    उड़ते हैं
    कभी तन्हा
    कभी क़तारों  में।

    @रवीन्द्र  सिंह  यादव

15 जुलाई 2017

तुम्हारा साथ.......

एक तुम्हारा साथ सजनी 
हमको हम से प्यारा है 
तुम चाह जीवन की मेरे
प्रेरक साथ तुम्हारा है....

बैठो जो पहलू में मेरे
रचूँ कविता साँझ-सवेरे
रहूँ निरखता रूप तुम्हारा
चंदा ज्यूँ बदली को घेरे....

करलूँ मैं बातें मीठी सी
रंग लूँ रात प्यार में
छू लूँ मैं हलके से तुमको
सावन की बहार में...

नैनों में देखूँ मैं दुनिया
दामन में सुख सपनों का 
हाथों में निरखूँ मैं किस्मत
आँगन को घर आपनों का....

.............................................© के. एल. स्वामी 'केशव'


कुछ भी व्यर्थ नहीं

हर रात नींद की क्यारी में
बोते है चंद बीज ख्वाब के
कुछ फूल बनकर मुस्कुराते है
कुछ दफ्न होकर रह जाते है
बनते बिगड़ते ज़िदगी के राह में
चंद सपनों के टूट जाने से
जीवन व्यर्थ नहीं हो सकता।

आस निराश के पंखो़ में उड़कर
पंछी ढ़ूढ़े बसेरा पेड़़ो से जुड़कर
कभी मिलती है छाँव सुखों की
धूप तेज लगती है दुखो की
हर दिन साँझ के रूठ जाने से
भोर का सूरज व्यर्थ नहीं हो सकता।

रोना धोना, रूठना मनाना
लड़ना झगड़ना बचपन सा जीवन
जिद में अड़ा कभी उदास खड़ा
खोने का डर पाने की हसरत
कभी बेवजह ही मुस्कुराता चला
मासूम ख्वाहिशों को हाथों मे लिये
चंद खिलौने के फूट जाने से
बचपन तो व्यर्थ नहीं हो सकता।

कुछ भी व्यर्थ नहीं जीवन में
हर बात में अर्थ को पा लो
चंद साँसों की मोहलत मिली है,
चाहो तो हर खुशी तुम पा लो
आँखों पे उम्मीद के दीये जलाकर
हर तम पे विजय तुम पा लो
कुछ गम के मिल जाने से
अर्थ जीवन का व्यर्थ नहीं हो सकता।

       #श्वेता🍁

9 जुलाई 2017

चूड़ियाँ

छुम छुम छन छन करती
कानों में मधुर रस घोलती
बहुत प्यारी लगी थी मुझको
पहली बार देखी जब मैंने
माँ की हाथों में लाल चूड़ियाँ
टुकुर टुकुर ताकती मैं
सदा के लिए भा गयी
अबोध मन को लाल चूड़ियाँ
अपनी नन्ही कलाईयों में
कई बार पहनकर देखा था
माँ की उतारी हुई नयी पुरानी
खूब सारी काँच की चूड़ियाँ

वक्त के साथ समझ आयी बात
कलाई पर सजी सुंदर चूड़ियाँ
सिर्फ एक श्रृंगारभर नहीं है
नारीत्व का प्रतीक है ये
सुकोमल अस्तित्व को
परिभाषित करती हुई
खनकती काँच की चूड़ियाँ
जिस पुरुष को रिझाती है
सतरंगी चूड़ियों की खनक से
उसी के बल के सामने
निरीह का तमगा पहनाती
ये खनकती छनकती चूड़ियाँ

ब्याह के बाद सजने लगती है
सुहाग के नाम की चूड़ियाँ
चुड़ियों से बँध जाते है
साँसों के आजन्म बंधन
चुड़ियों की मर्यादा करवाती
एक दायित्व का एहसास
घरभर में खनकती है चूड़ियााँ
सबकी जरूरतों को पूरा करती
एक स्वप्निल संसार सजाती
रंग बिरंगी काँच  की चूड़ियाँ

चूड़ियों की परिधि में घूमती सी
अन्तहीन ख्वाहिशें और सपनें
टूटते,फीके पड़ते,नये गढ़ते
चूड़ियों की तरह ही रिश्ते भी
हँसकर रोकर सुख दुख झेलते
पर फिर भी जीते है सभी
एक नये स्वप्न की उम्मीद लिए
कलाईयों में सजती हुई
नयी काँच चूड़ियों की तरह
जीवन भी लुभाता है पल पल
जैसे खनकती काँच की चूड़ियाँ

               #श्वेता🍁

6 जुलाई 2017

एक ख्वाब

खामोश रात के दामन में,
जब झील में पेड़ों के साये,
गहरी नींद में सो जाते है
उदास झील को दर्पण बना
चाँद मुस्कुराता होगा,
सितारों जड़ी चाँदनी की
झिलमिलाती चुनरी ओढ़कर
डबडबाती झील की आँखों में
मोतियों सा बिखर जाता होगा
पहर पहर रात को करवट
बदलती देख कर दिल
आसमां का धड़क जाता होगा
दूर अपने आँगन मे बैठा
मेरे ख्यालों में डूबा वो
हथेलियों में रखकर चाँद
आँखों में भरकर मुहब्बत
मेरे ख्वाब सजाता तो होगा।

5 जुलाई 2017

भाग्य विधाता....प्रमोद राय


न्यूज पोर्टल का “साप्ताहिक राशिफल” सेक्शन खूब हिट हो रहा था। कोई ऐसा दिन नहीं था, जब दो-चार ई-मेल न आते हों। पाठकों की जबर्दस्त प्रतिक्रिया को देखते हुए वेबसाइट के होमपेज पर “राशिफल” को थोड़ा हाईलाइट किया गया।

एक दिन कॉपी एडिटर राधेश्याम ने बॉस को बताया कि पंडित चतुरानन चतुर्वेदी के यहाँ से अभी तक राशिफल नहीं आया है। आमतौर पर राशिफल की कॉपी शुक्रवार तक दफ्तर में पहुँच जाती थी। राधेश्याम हस्तलिखित राशिफल को कंपोज करता, फिर उन्हें एडिट करके हर वीकेंड साइट पर अपलोड किया करता था। बॉस ने पंडित चतुरानन के यहाँ फोन करवाया तो पता चला कि आउट ऑफ स्टेशन हैं। बॉस ने खीझते हुए कहा, इसका भी भाव बढ़ता जा रहा है, लगता है कॉन्ट्रैक्ट तोड़ना पड़ेगा। फिर चुटकी बजाते हुए बोले, "यार राधेश्याम, एक काम करो। दो चार महीने पुराना राशिफल उठाओ, भाषा में थोड़ा फेरबदल करो और अपलोड कर दो।"

धश्याम ने वैसा ही किया। अगले हफ्ते फीडबैक और जबर्दस्त था। इस सेक्शन पर कई गुना ज्यादा “हिट”पड़े । ई-मेल की संख्या भी बढ़ी थी, जिनमें से कई में सटीक भविष्यवाणी के कसीदे पढ़े गए थे।

कुछ दिनों बाद फिर ऐसा हुआ कि पंडित चतुरानन चतुर्वेदी समय पर राशिफल नहीं भेज पाए। इस बार राधेश्याम को एक नया आयडिया सूझा। उसने पिछले महीने का राशिफल उठाया। राशियों का भाग्यफल परस्पर बदलते हुए मेष की जगह कर्क, तुला की जगह मिथुन और कुंभ की जगह धनु की भविष्यवाणियाँ “कट एण्ड पेस्ट” कर दीं। बिल्कुल नया राशिफल तैयार था।

कुछ दिनों बाद बेहतर फीडबैक और साइट की बढती रेटिंग को देखते हुए “साप्ताहिक राशिफल” को बदलकर “आज का राशिफल” कर दिया गया। अब यह सेक्शन रोजाना अपडेट होने लगा।

-प्रमोद राय

4 जुलाई 2017

बेबस आवाज

बेबस आवाज

बेबस है एक आवाज 
लोगो के जर्जर तहखाने मे
व्याकुल हो उठती है
जब कभी कोई 
शोर सुनाई देता है
डरी हुई थोड़ी सहमी सी 
इन महानगरों के 
दोहरे आचरण से
जहाँ असत्य का आधिक्य है
जहाँ सत्य का मुद्रा से विनिमय
उसकी आँखों के सामने होता है
जहाँ हर रोज कोई हिंसा किसी
नवजात रूपी अवधारणा 
का हरण कर लेती है
विलुप्ति की कगार पर 
खड़ी होकर 
हर क्षण खोजती है
कुछ दर्रो को 
जहाँ से वो स्वतंत्र होकर
सूर्य की किरणों का 
अवलोकन कर पाए
संचारित हो सके उनमे
प्राणदायक आशाए
पनपती है इसलिये
निरन्तर कि कोई धारणा 
अपवाद न बन जाये
अक्सर उलझ जाती है
परंपरावादी समाज मे
नही सुलझा पाती है खुद को 
धीरे धीरे ह्रसित होकर
स्वयं अपना ही अस्तित्व 
समाप्त कर लेती है


----- हिमांशु मित्रा 'रवि'

प्रकृति का स्वरूप....

 प्रकृति का स्वरूप


परिदृश्य परिवर्तित हो गया इसका 
     जिसकी अठखेलियों का 
सम्मोहन कभी सूर्य की किरणों को 
अल्पकालीन निद्रा मे डूबा देता था
 जिसके आगमन पर चंद्र 
भी बादलों का आवरण हटा देता था
जिसका एहसास मात्र दोहरी शुष्क 
      नयनों को नम कर देता था
जिसका अवलोकन मात्र ही ह्रदय 
    आघात को कम कर देता था 
निश्चित ही ये वही है जिसकी गोद मे 
    बैठ कर पक्षी करलव करते थे
जिसकी सानिध्य मे रहकर घुमक्कड़
  मूर्तियों में रंग को भरते थे
  जिसके एक सूक्ष्म दृश्य से चौपालों का 
  शून्यकाल संतृप्ति मे आ जाता था
    उसके आते ही मौसम का रूप 
      परिवर्तित हो जाता था
       पर शायद उसमे 
      अब  वो  बात  नही
     दिन तो ढलता है पर उसके 
         आगे चाँदनी रात नही 
       निर्रथक समय संयोजित हो जाता है 
        मौसम का रंग भी परिवर्तित हो जाता है
      पर चौपालों का शून्यचक्र नही बढ़ता 
        ये पवन भी शाखों का रूप नही गढ़ता 
         चिंतन न कर हे मानव ! 
         ये तेरी ही परिकल्पनाओं का परिणाम है
         गति देना चाहता था तू जिस जीवन को 
        आज उस पर ही अल्पविराम है
        समय शेष है अब भी तू अपनी
       नगण्य चेष्टाओ को संकुचित कर ले
    बर्हिगमन कर स्वार्थ का अपनी 
       शिराओं से प्रकृति प्रेम के रक्त को भर ले


                     ------ हिमांशु मित्रा 'रवि' 

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो---साहिर

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो।

कदम कदम पे चट्टानें खड़ी रहें, लेकिन
जो चल निकलते हैं दरिया तो फिर नहीं रुकते।
हवाएँ कितना भी टकराएँ आंधियाँ बनकर,
मगर घटाओं के परछम कभी नहीं झुकते।
मेरे नदीम मेरे हमसफर .....

हर एक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं, मगर
हर एक तलाश मुरादों के रंग लाती है।
हज़ारों चांद सितारों का खून होता है
तब एक सुबह फिज़ाओं पे मुस्कुराती है।
मेरे नदीम मेरे हमसफर ....

जो अपने खून को पानी बना नहीं सकते
वो ज़िन्दगी में नया रंग ला नहीं सकते।
जो रास्ते के अन्धेरों से हार जाते हैं
वो मंज़िलों के उजालों को पा नहीं सकते।

मेरे नदीम मेरे हमसफर, उदास न हो।
कठिन सही तेरी मंज़िल, मगर उदास न हो |

3 जुलाई 2017

त्रिवेणी: 770

बेहद सारगर्भित रसमय कविता त्रिवेणी: 770

भँवर..........निर्मला शर्मा 'निर्मल'










समुद्र की गहराई तक 
पहुँचने के लिए
मुझे इक भँवर चाहिए। 
लहरों के सहारे 
पार लग जाऊँ 
यह इच्छा नहीं है मेरी,
मुझे तो मंथन चाहिए 
अथाह प्यार चाहिए 
सागर की गहराई का 
जिसमें डूब कर 
उभर जाऊँ मैं।
-निर्मला शर्मा 'निर्मल'

30 जून 2017

गीत

बचा लो मेरा हिंदुस्तान

राजेश त्रिपाठी
ऐ मेरे प्यारे खुदा ऐ मेरे भगवान, बचा लो मेरा हिंदुस्तान।
        कुछ नासमझों की हरकत से तेरे बंदे हैं बेहद हलकान ।। (बचा लो)

कुछ  बंदे  अकल के  अंधे करते हैं मनमानी।
भूल  रहे इस देश के वासी हैं पहले हिंदुस्तानी।। 
जाति-धर्म  के  पचड़े में फंस करते हैं नादानी।
अपने  ही  भाई को  मारें कैसे हैं ये प्राणी ।।

जाने किस गफलत में डूबे इनका खोया धर्म- ईमान। (बचा लो)
सबको बराबरी का हक देता अपना देश स्वतंत्र।
धर्म-कर्म की  यहां आजादी  ये ऐसा गणतंत्र।।
लेके लुकाटी निकल पड़े यहां अभी कुछ लोग।
लोगों के घर-द्वार जलाते बढ़ता जाता है रोग।।

रोके से भी नहीं रुक रही इन बड़बोलों की जुबान। (बचा लो)
कौन क्या पहने, क्या खाये है इसकी आजादी।
इसको लेकर जुल्म ढा रहे करते हैं बरबादी।।
चहुंदिशि हाहाकार मचा है टूट रहा  विश्वास ।
गणतांत्रिक देश की खातिर बुरा है यह एहसास।।

इससे ताशमहल से ध्वस्त हो रहे जनता के अरमान।।  (बचा लो)
ड्रैगन आंख तरेर रहा है, पाक करे हरकत नापाक।
दुश्मनों से घिरा देश है जो करना चाहें इसको खाक।।
अपने भी  कर रहे हैं ऐसा कि देश हुआ है अशांत।
ऐसे में  तो  यही कहेंगे ये हैं बुद्धि से उद्भ्रांत ।।


समरसता के अमृत में विष घोलें ये हैं ऐसे अनजान।। (बचा लो)

महक-सी आ रही है साज़िशों की.....नकुल गौतम


झड़ी जब लग रही हो आँसुओं की
कमी महसूस क्या हो बदलियों की

हवेली थी यहीं कुछ साल पहले
जुड़ी छत कह रही है इन घरों की

वो मुझ पर मेहरबां है आज क्यों
महक-सी आ रही है साज़िशों की

मुझे पहले मुहब्बत हो चुकी है
मुझे आदत है ऐसे हादसों की

अदालत आ गए इंसाफ़ लेने
मती मारी गयी थी मुफ़लिसों की

चले हैं जंग लड़ने दोपहर में
ज़रा हिम्मत तो देखो जुगनुओं की

हमारा वक़्त भी अब आता होगा
'नकुल' बस देर है अच्छे दिनों की
-नकुल गौतम

27 जून 2017

फितूर था

तेरी निगाहों के नूर से दिल मेरा मगरूर था

भरम टूटा तो जाना ये दो पल का सुरूर था


परिंदा दिल का तेरी ख्वाहिश में मचलता रहा

नादां न समझ पाया कभी चाँद बहुत दूर था


एक ख्वाब मासूम सा पलकों से गिरकर टूट गया

अश्कों ने बताया ये बस मेरे दिल का फितूर था


चाहकर भी न मुस्कुरा सके वो  दर्द इतना दे गये

जज़्बात हम सम्हाल पाते इतना भी न शऊर था


दिल की हर दुआ में बस उनकी खुशी की चाह की

इतनी शिद्दत से इबादत कर ली यही मेरा कुसूर था


     #श्वेता🍁


क़ैद करोगे अंधकार में / पाश



क्या-क्या नहीं है मेरे पास
शाम की रिमझिम
नूर में चमकती ज़िंदगी
लेकिन मैं हूं
घिरा हुआ अपनों से
क्या झपट लेगा कोई मुझ से
रात में क्या किसी अनजान में
अंधकार में क़ैद कर देंगे
मसल देंगे क्या
जीवन से जीवन
अपनों में से मुझ को क्या कर देंगे अलहदा
और अपनों में से ही मुझे बाहर छिटका देंगे
छिटकी इस पोटली में क़ैद है आपकी मौत का इंतज़ाम
अकूत हूँ सब कुछ हैं मेरे पास
जिसे देखकर तुम समझते हो कुछ नहीं उसमें



26 जून 2017

अँधेरे में रौशनी की किरण – हेलेन केलर

27 जून 1880 - 1 जून 1968
कहते हैं जब सारे  दरवाजे बंद हो जाते हैं तो भगवान एक खिड़की खोल देता है , लेकिन अक्सर हम बंद हुए दरवाजे की ओर इतनी देर तक देखते रह जाते हैं कि खुली हुई खिड़की की ओर हमारी दृष्टी भी नही जाती। ऐसी परिस्थिति में जो अपनी दृण इच्छाशक्ति से असंभव को संभव बना देते हैं, वो अमर हो जाते हैं।दृण संकल्प वह महान शक्ति है जो मानव की आंतरिक शक्तियों को विकसित कर प्रगति पथ पर सफलता की इबारत लिखती है। मनुष्य के मजबूत इरादे दृष्टीदोष, मूक तथा बधिरता को भी परास्त कर देते हैं। अनगिनत लोगों की प्रेरणा स्रोत, नारी जाति का गौरव मिस हेलेन केलर शरीर से अपंग पर मन से समर्थ महिला थीं। उनकी दृण इच्छा शक्ति ने दृष्टीबाधिता, मूक तथा बधिरता को पराजित कर नई प्रेरणा शक्ति को जन्म दिया।

27 जून 1880 को जन्म लेने वाली ये बालिका 6 महिने में घुटनो चलने लगी और एक वर्ष की होने पर बोलने लगी। जब 19 माह की हुईं तो एक साधारण से ज्वर ने हँसती-खेलती जिंदगी को ग्रहण लगा दिया। ज्वर तो ठीक हो गया किन्तु उसने हेलन केलर को दृष्टीहीन तथा बधिर बना दिया। सुन न सकने की स्थिती में बोलना भी असंभव हो जाता है। माता-पिता बेटी की ये स्थिती देखकर अत्यधिक दुःखी हो गये। ऐसा लगने लगा कि उनकी पुत्री पर किसी ने मुश्किंलो का वज्रपात कर दिया हो। हेलन का बचपन कठिन दौर से गुजरने लगा, किसी को आशा भी न थी कि कभी स्थिति सुधर भी सकती है।

एक दिन हेलेन की माँ समाचार पत्र पढ रहीं थीं, तभी उनकी नजर बोस्टन की परकिन्स संस्था पर पङी। उन्होने पुरा विवरण पढा। उसको पढते ही उनके चेहरे पर प्रसन्नता की एक लहर दौङ गई और उन्होने अपनी पुत्री हेलन का दुलार करते हुए कहा कि अब शायद मुश्किलों का समाधान हो जाए। हेलन के पिता ने परकिन्स संस्था की संरक्षिका से अनुरोध किया जिससे वे हेलेन को घर आकर पढाने लगी। यहीं से हेलेन केलर की जिंदगी में परिर्वन शुरु हुआ। केलर की अध्यापिका सुलीवान बहुत मुश्किलों से उन्हे वर्णमाला का ज्ञान करा सकीं। एक-एक अक्षर को केलर कई-कई घंटो दोहराती थीं, तब कहीं जाकर वे याद होते थे। धीरे -धीरे वे बोलने का भी अभ्यास करने लगीं जिसमें उन्हें आंशिक सफलता प्राप्त हुई। हेलेन की इस सफलता के पीछे उनका संकल्प बल कार्य कर रहा था। कठिन परिश्रम के बल पर उन्होने लैटिन, फ्रेंच और जर्मन भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। 8 वर्षों के घोर परिश्रम से उन्होने स्नातक की डिग्री प्राप्त कर ली थी। उन्हे सारे संसार में लोग जानने लगे थे। आत्मा के प्रकाश से वे सब देख सकती थीं तथा बधिर होते हुए भी संगीत की धुन सुन सकती थीं। उनका हर सपना रंगीन था और कल्पना र्स्वणिम थी।

सुलिवान उनकी शिक्षिका ही नही, वरन् जीवन संगनी जैसे थीं। उनकी सहायता से ही हेलेन केलर ने टालस्टाय, कार्लमार्क्स, नीत्शे, रविन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गाँधी और अरस्तू जैसे विचारकों के साहित्य को पढा। हेलेन केलर ने ब्रेल लिपि में कई पुस्तकों का अनुवाद किया और मौलिक ग्रंथ भी लिखे। उनके द्वारा लिखित आत्मकथा ‘मेरी जीवन कहानी’ संसार की 50 भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है।

अल्पआयु में ही पिता की मृत्यु हो जाने पर प्रसिद्ध विचारक मार्कट्वेन ने कहा कि, केलर मेरी इच्छा है कि तुम्हारी पढाई के लिए अपने मित्रों से कुछ धन एकत्रित करूँ। केलर के स्वाभिमान को धक्का लगा। सहज होते हुए मृदुल स्वर में उन्होने मार्कट्वेन से कहा कि यदि आप चन्दा करना चाहते हैं तो मुझ जैसे विकलांग बच्चों के लिए किजीए, मेरे लिए नही।

एक बार हेलेन केलर ने एक चाय पार्टी का आयोजन रखा, वहाँ उपस्थित लोगों को उन्होने विकलांग लोगों की मदद की बात समझाई। चन्द मिनटों में हजारों डॉलर सेवा के लिए एकत्र हो गया। हेलेन केलर इस धन को लेकर साहित्यकार विचारक मार्कट्वेन के पास गईं और कहा कि इस धन को भी आप सहायता कोष में जमा कर लिजीए। इतना सुनते ही मार्कट्वेन के मुख से निकला, संसार का अद्भुत आश्चर्य। ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि हेलेन केलर संसार का महानतम आश्चर्य हैं।


मार्कट्वेन ने कहा था किः- 
19वीं शताब्दी के दो सबसे दिलचस्प व्यक्ति हैं, 
“नेपोलियन और हेलेन केलर”

हेलेन केलर पूरे विश्व में 6 बार घूमीं और विकलांग व्यक्तियों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण वातावरण का निर्माण किया। उन्होने करोङों रूपये की धन राशि एकत्र करके विकलांगो के लिए अनेक संस्थानो का निर्माण करवाया। दान की राशि का एक रुपया भी वे अपने लिए खर्च नही करती थीं।

विश्व की अनेक विभूतियों से उनकी मुलाकात हुई थी। मुलाकात के दौरान रविन्द्रनाथ टैगोर तथा पं. जवाहरलाल नेहरु से वे बहुत प्रभावित हुईं थीं। हेलेन केलर की मस्तिष्क शक्ति इतनी जागरुक थी कि वे आगंतुक की पदचाप से ही उसके बारे में बहुत कुछ बता देती थीं। वे विभिन्न रंगो को स्पर्श करके पहचान लेती थीं। ‘एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा आप मात्र 19 महिने की थीं जब दिखाई देना बंद हो गया था, तो आप दिन रात कैसे बता पाती हैं। हेलेन केलर का उत्तर विज्ञान सम्मत था, उन्होने कहा कि – दिन में हलचल अधिक होती है। हवा का प्रवाह मंद रहता है। वातावरण में कंपन बढ जाती है और शाम को वातावरण शांत तथा कंपन मंद हो जाती है।‘

विज्ञान ने आज भले ही बहुत उन्नति कर ली हो, लगभग सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली हो किन्तु वे अभी भी सबसे खतरनाक शत्रु पर विजय पाने में असर्मथ है, वह शत्रु है मनुष्य की उदासीनता। विकलांग लोगों के प्रति जन साधारण की उदासीनता से हेलेन केलर बहुत दुःखी रहती थीं।

हेलेन केलर का कहना था किः- हमें सच्ची खुशी तबतक नही मिल सकती जबतक हम दूसरों की जिंदगी को खुशगवार बनाने की कोशिश नही करते। हेलेन केलर ने अंधे व्यक्तियों के हित के लिए उन्हे शिक्षित करने की जोरदार वकालत की।

हेलेन केलर को घोङे की सवारी करना बहुत प्रिय था। जब वे घोङे पर बैठकर हवा से बातें करती तो लोगों का ह्रदय अशुभ आशंका की ओर चला जाता। परंतु हेलेन केलर ने दृष्टीबाधिता के बावजूद सभी दिशाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। प्रभु के चरणों में जीवन का भार सौंपने वाली हेलेन केलर हमेशा निश्चिंत रहती थीं।

हेलेन केलर का कथन था किः- विश्वास ही वह शक्ति है जिसकी बदौलत ध्वस्त हुआ संसार भी सुख की रौशनी से आबाद हो सकता है।

1943 में,द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हेलेन देश भर के सैनिक अस्पतालों में घूम-घूमकर अंधे, गूंगे तथा बहरे सैनिकों से मिलती रहीं। 1946 में ‘अमेरीकन ब्रेल प्रेस’ को ‘द अमेरीकन फाउनडेशन फॉर ओवरसीज ब्लाइंड ’ नाम दिया गया। जो आज ‘हेलेन केलर इंटरनेशनल’ के नाम से जाना जाता है।

स्वालंबन उनके जीवन का प्रमुख गुण था। भोजन बनाना, वस्त्र पहनना, तथा साफ-सफाई के सभी कार्य़ वे स्वयं करती थीं। 1 जून 1968 को ह्रदय का दौरा पङने से वो इस संसार से विदा हो गईं, परन्तु उनका जीवन प्रत्येक मानव को जन्म-जन्मांतर तक प्रेरणा देता रहेगा। पुरूषार्थ का महत्व बताने वाली हेलेन केलर ने मानवीय चरित्र को नई गरिमा ही नही बल्कि मानव पुष्प को नई सुगंध से सुगंधित किया है। हिम्मत और हौसले की मिसाल हेलेन केलर का सम्पूर्ण जीवन हम सभी के लिए एक उदाहरण है।

हेलेन केलर के सम्मान में मेरे श्रद्धा शब्द सुमनः-


आँधियों को जिद्द थी जहाँ बिजलियाँ गिराने की,
हेलेन केलर को जिद्द थी वहीँ आशियाँ बनाने की।


(हेलेन केलर पर हिन्दी सिनेजगत में फिल्म भी बन चुकी है जिसका नाम ब्लैक था। उसमे हेलेन केलर की भूमिका रानी मुर्खजी ने बहुत ही संजीदगी से अदा की है।)



25 जून 2017

संदेश "आज के बच्चों के लिये"

चाँद पे जाना
मंगल पे जाना
दुनिया बचाना
बच्चो मगर
भूल ना जाना ।

मोबाइक में आना
मोबाइल ले जाना
कापी पेन बिना
स्कूल ना जाना ।

केप्री भी बनाना
हिपस्टर सिलवाना
खादी का थोडा़ सा
नाम भी बचाना ।

जैक्सन का डांस हो
बालीवुड का चांस हो
गांधी टैगोर की बातें
कभी तो सुन जाना ।

पैसा भी कमाना
बी एम डब्ल्यु चलाना
फुटपाथ मे सोने वालों
को ना भूल जाना ।

भगत सिंह का जोश हो
सुखदेव का होश हो
आजाद की कुर्बानी
जरा बताते चले जाना ।

पंख भी फैलाना
कल्पना में खो जाना
दुनिया बनाने वाला
ईश्वर ना भुलाना ।

कम्प्टीशन में आना
कैरियर भी बनाना
माँ बाबा के बुढापे
की लाठी ना छुटवाना ।

उलूक टाइम्स से साभार

अरे मीरा...ये कोविन्द है...गोविन्द नहीं....अशोक पुनमिया


कहाँ हो रहा है राष्ट्रपति चुनाव???
ये तो दलित-दलित खेल चल रहा है!
रामनाथ कौविंद आये या मीरा कुमार-क्या फर्क पडना है!
देश के सारे के सारे सियासी दल जात-पात के दलदल में लोट रहे हैं और 2019 के चुनावों पर गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे हैं!
राजनीति की गिरावट मापने का अगर कोई थर्मामीटर बना होता तो निश्चित ही अब तो उसका पारा थर्मामीटर तोड़ कर बाहर आकर आत्महत्या कर चुका होता!
अब तक तो यह कहा जाता था कि राष्ट्रपति मात्र एक रबर स्टेम्प होता है! लेकिन अब ये भी कहा जाएगा कि राष्ट्रपति रबर स्टेम्प के साथ साथ वोटों के लिए एक मोहरा भी है,क्योंकि 56 इंची सीने से लगाकर तमाम पप्पू,अप्पू,लालू,भालू,और सियासत के सारे कालू राष्ट्रपति को मात्र मोहरा बना कर अपनी मूंछों पर ताव दे रहे हैं!
चुनावों के मद्देनज़र सभी नेताओं और दलों के तमाम "विज़न" फेल हो जाते हैं,और उनकी जीभ बस कुर्सी के लिए लपलपाने लग जाती है!
अंग्रेजों से मुक्त हुए भारत के अवाम की तरक्की तब तक संभव नहीं, जब तक कि क्षुद्र राजनीति हिंदमहासागर में डूब कर मर ना जाए!!
- अशोक पुनमिया

24 जून 2017

अंतिम अनुभव

उम्र  के  अंतिम  पड़ाव  पर 
सुध  बुध   भी   खो  गयी 
बंद कमरे में एक छोटी सी खिड़की 
मेरी  सारी  दुनिया  हो  गयी 
जो  मुझे  साँझ  और  सवेरे   
 से  परिचित  करवाती  थी  
झरोखे से आती सूरज की रौशनी 
सिर्फ एक कोने तक आती  थी 
ये जर्जर शरीर अपनी ही हडियों का 
 बोझ  भी  नहीं  उठा  पाता  था 
तन्हाई अब सिर्फ साथी थी  अपनी 
इसी से अपने दिल को बहलाता था 
जिंदगी का सफर जब शुरू हुआ था 
तब  साथ  में  इक  मेला  था 
मगर  अब परिवार के बीच  भी 
मैं  बिलकुल  अकेला  था 
मुठी  भर  दवाइयां  ही 
अब  आगे  की सच्ची साथी थी 
अंतिम  अनुभव  में ये  सीखा 
कि ये ही अंत तक साथ निभाती थी 
अगली  सुबह  ऐसा  लगा  जैसे 
मैं  हवा  में  उड़  रहा  था 
मेरा शरीर अंतिम सफर के  लिए 
चार कन्धों पर आगे बढ़ रहा था 
उस  टूटे  हुए  पिंजरे  से  
अब  पंछी  आज़ाद  हो  चुका  था 
काफी  इंतज़ार के बाद ही सही 
इक नए सफर का आगाज़ हो चुका था